शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

आदिवासी साहित्य का उत्तर आधुनिक स्वरूप और लोक जागरण

                                                                   शोध-पत्र-सारांश

          आदिवासी साहित्य का उत्तर आधुनिक स्वरूप और लोक जागरण

                                                           डॉ0 मनजीत सिंह
                  
    आदिवासी साहित्य का समाज परिवर्तित मानदंडों पर रूप ग्रहण करता हुआ, तथाकथित ’सबआल्टर्न’ से प्रारंभ अपनी या़त्रा में आये समस्त पड़ावों पर संघर्षरत गिरिजनों की व्यथा-कथा को आत्मसात् करके तमाम अन्तर्विरोंधों को स्वतः समंजित करके हिन्दी साहित्य की नयी संभावनाओं को दिन-प्रतिदिन तराशकर क्रांतिकारी परिवर्तन की मांग भी करता है। इसके साथ ही शोध के नये-नये अवसर ईजाद करने के निमित्त वैश्विक प्रभाव ग्रहण करते हुए ऐतिहासिक संबंधों को पुष्ट आधार प्रदान करके पुनर्मूल्यांकन हेतु मजबूर भी करता है। वर्तमान समय में यह साहित्य मौखिक बनाम लिखित के बीच स्वयं को पाकर अधूरा भी महसूस करता है। लेकिन प्रसंगतः  डॉ. कुमार वीरेन्द्र लिखते हैं कि, ’’वास्तव में जीवन के विविध पहलुओं से जान पहचान कराता आदिवासी विमर्श संघर्ष, उल्लास और आक्रामकता का साहित्य है। छल-कपट, भेद-भाव, ऊँच-नीच से रहित तथा सामाजिक न्याय का पक्षधर इस विमर्श का आधार आदिवासियों की संस्कृति, भाषा, इतिहास, भूगोल तथा उनके जीवन की अनेक समस्याओं और प्रकृति के प्रति उनका आत्मिक लगाव है। दरअसल आदिवासी विमर्श की दृष्टि से हिन्दी में प्रचुर मात्रा में लेखन हो रहा है। इससे न केवल (आदिवासी संस्कृति से) हिन्दी समृद्ध हुई है, बल्कि आदिवासी जीवन-शैली, समानता, भाईचारा और आजादी के सूत्रों को हिन्दी पट्टी और हिन्दी भाषी मानस ने भी कुछ हद तक ग्रहण किया है। यह हिन्दी भाषी मानस में दृष्टिकोणात्मक बदलाव लाने में काफी सहायक हो रहा है।’’ इसका उदाहरण हमें हिन्दी में प्राप्य कथा साहित्य के साथ ही उत्तर-पूर्व, मध्य, पश्चिम और दक्षिण भारत में लिखें जाने वाले साहित्य का स्मरण लाजमी है।
‘तद्भव’ के दलित विशेषांक में ’आदिवासी साहित्य की उपस्थिति’ शीर्षक में नवल शुक्ल ने साहित्य की विकसित परंपरा का उल्लेख करते हुए दलित साहित्य की चर्चा के साथ ही आदिवासी साहित्य के ज्वलंत प्रश्नों को उजागर करने का प्रयास किया है। इन्हांेने इसे उपेक्षित साहित्य या आदिवासी साहित्य के रूप में आत्मसात् करते हुए उचित ही कहा है कि, ‘’अभी तक मैं आदिवासी अंँचलो या लोकांचलों में काम करते हुए देखता रहा हँॅंू कि कौन गायक है, कौन नर्तक, कौन चित्रकार है, कौन शिल्पकार। सृजन के विविध माध्यमों में आदिवासी समुदाय को परम्परागत ज्ञान के साथ काम करते हुए और अपने स्थानीय ज्ञान को शिद्दत के साथ बचाये रखने एवं उसका उपयोग करते रहने के कारण समुदाय के प्रति श्रद्धा, सम्मान और जिज्ञासा का भाव हमेशा बना रहा। हमेशा ऐसा लगता है कि अपने पुरूखों के बीच हँॅूं और उनसे ज्ञान, सीख समझ रहा हँॅंू । इनमें जीवन संघर्ष, जीवनानुभव और सहज अभिव्यक्ति इस तरह संचित और सतत् विद्यमान है, जैसे पानी में हाइडोªजन और ऑक्सीजन।’’ इस प्रकार आदिवासी साहित्य लेखन की वास्तविक उपलब्धि उस समुदाय के लेखकों की अभिव्यक्ति और रचनात्मक उद्देश्य से प्रेरित है।
यही कारण है कि झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति की महासचिव वंदना टेटे ने 29 जुलाई जेएनयू में आदिवासी साहित्य पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में उचित कहा थ कि, ’’आदिवासियों पर रिसर्च करके लिखी जा रही रचनाएँ शोध साहित्य है, आदिवासी साहित्य नहीं। आदिवासियत को नहीं समझने वाले हिन्दी के लेखक आदिवासी साहित्य लिख भी नहीं सकते। हमें याद रखना चाहिए कि आदिवासी समुदायों पर सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में हुए अधिकांश अध्ययन एक भ्रामक, नस्लीय और औपनिवेशिक तस्वीर पेश करते हैं। हिन्दी साहित्य लेखन तो वैसे भी लेखकों का सेकेंडरी काम है, उनका प्राथमिक पेशा तो कुछ और होता है। ऐसे में टेबल, इंटरनेट, एंथ्रोपोलोजी की पुस्तकों और कुछ दिन आदिवासी इलाके में घूम-घामकर जुटायी गयी जानकारियों से कोई कैसेसंवेदनशीलता के साथ आदिवासी जीवन की सच्ची कहानी बयान कर सकता है? वह भी उस स्थिति में जब वह आदिवासियों की भाषा और न संस्कृति की कोई सामान्य समझ भी रखता है? यह प्रश्न विचारणीय परन्तु सटीक है क्योंकि वंदना टेटे जी ने इसके माध्यम से आदिवासी साहित्य के यथार्थ स्वरूप की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कराती हैं, जिसका सीधा संबंध जनजातीय समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने के निमित्त किये जा रहे प्रयासों में आये ऐसे जागरण से है, जिसका उत्स लोक में है।

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